हाड़ौती का पहला मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी सेंटर बना ईथॉस हॉस्पिटल

ऑपरेशन टेबल पर लौटी जिंदगी, 4 दिन में स्वस्थ हुआ मरीज, अब हर सेकंड कीमती: ईथॉस हॉस्पिटल में शुरू जीवन रक्षक थ्रोम्बेक्टॉमी सेवा

कोटा। हाड़ौती अंचल में उन्नत चिकित्सा सुविधाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए विवेकानंद नगर स्थित ईथॉस हॉस्पिटल में अत्याधुनिक मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी तकनीक के माध्यम से लकवा (स्ट्रोक) के मरीजों को अप्रत्याशित और जीवनदायी परिणाम मिल रहे हैं।खास बात यह है कि पूरे हाड़ौती संभाग में यह सुविधा केवल ईथॉस हॉस्पिटल में ही उपलब्ध है, जिससे क्षेत्र के हजारों मरीजों को अब जयपुर या दिल्ली जाने की जरूरत नहीं है।यह तकनीक क्षेत्र में न्यूरो-इंटरवेंशन के क्षेत्र में नई उम्मीद बनकर उभरी है।ईथॉस हॉस्पिटल के एचओडी न्यूरोसाइंसेज डीएम (न्यूरोलॉजी) डा. अमित देव ने बताया कि इस प्रक्रिया में कैथेटर के माध्यम से जांघ की धमनी से होते हुए मस्तिष्क तक पहुंचा जाता है और विशेष स्टेंट रिट्रीवर की मदद से थक्के को बाहर निकाल दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया बिना बड़े ऑपरेशन के, कम समय में पूरी हो जाती है।
चिकित्सकों के अनुसार, इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह स्ट्रोक के बाद “गोल्डन आवर” की समयसीमा को बढ़ाने में सहायक है। जहां पहले 4.5 घंटे तक ही प्रभावी इलाज संभव माना जाता था, वहीं अब चयनित मामलों में 6 से 24 घंटे तक भी मरीजों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। इससे दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले मरीजों के लिए भी उपचार की संभावना बढ़ जाती है। मरीज जितना जल्दी डाक्टर से सम्पर्क करेगा उतना अधिक लाभ उन्हे मिलेगा।

अंचल के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
ईथॉस हॉस्पिटल के निदेशक दाधीच ने बताया कि अब तक हाड़ौती के स्ट्रोक मरीजों को इस उपचार के लिए जयपुर, दिल्ली या मुंबई रेफर करना पड़ता था, जिसमें कीमती समय नष्ट होने से मरीज की जान को खतरा बढ़ जाता था। निदेशक जितेन्द्र गोयल ने बताया कि ईथॉस हॉस्पिटल में यह सुविधा शुरू होने से कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ सहित मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिलों के मरीजों को भी समय पर उपचार मिल सकेगा।

ऑपरेशन टेबल पर ही लौटी जिंदगी
वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डा. आशीष पेमावत ने बताया कि बंसीलाल मालव को दाहिने हिस्से में कमजोरी और अचेत अवस्था में अस्पताल लाया गया। जांच में लेफ्ट एमसीए टेरिटरी ब्रेन स्ट्रोक की पुष्टि हुई। गंभीर स्थिति को देखते हुए मरीज को तुरंत आईसीयू में भर्ती किया गया।
सेरेब्रल एंजियोग्राफी के माध्यम से अवरुद्ध धमनी (Left MCA M1) की सटीक पहचान कर अत्याधुनिक मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी (ADAPT तकनीक) से उपचार किया गया। पहले ही प्रयास में पूर्ण रीकैनालाइजेशन (mTICI 3) प्राप्त होने से मस्तिष्क में रक्त प्रवाह तुरंत सामान्य हो गया। उपचार के दौरान ऑपरेशन टेबल पर ही सुधार के संकेत मिलने लगे। विशेषज्ञ निगरानी में महज चार दिनों में मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो गया और 24 फरवरी को डिस्चार्ज कर दिया गया।

अत्याधुनिक प्रक्रिया से मरीजों को यह मिलेगे लाभ
सीईओ हर्ष दाधीच एवं स्ट्रैटेजिक पार्टनर रुपेश माथुर ने बताया कि स्ट्रोक के इलाज में आधुनिक मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी तकनीक ने पारंपरिक उपचार की तुलना में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। जहां पारंपरिक उपचार केवल दवाइयों पर निर्भर रहता है, वहीं इस नई तकनीक में मस्तिष्क की नसों में बने थक्के को सीधे निकाल दिया जाता है। पारंपरिक पद्धति में सफलता दर सीमित होती है और बड़े क्लॉट के मामलों में यह अक्सर अप्रभावी साबित होती है। इसके विपरीत, मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी 80-90 प्रतिशत मामलों में रक्त प्रवाह बहाल करने में सक्षम है और बड़े से बड़े थक्के में भी प्रभावी मानी जाती है। गोल्डन टाईम की बात करें तो पारंपरिक इलाज में यह केवल 4.5 घंटे तक सीमित रहती है, जबकि इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से चयनित मामलों में 24 घंटे तक उपचार संभव हो पाता है।
सुपरिन्टेंडेंट एथोस हॉस्पिटल डा राजेश गोयल ने अपील की है कि स्ट्रोक के लक्षण जैसे अचानक शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, बोलने में दिक्कत, चेहरे का टेढ़ा होना या दृष्टि में बदलाव दिखते ही तुरंत चिकित्सा सहायता लें। समय पर पहचान और उपचार ही जीवन बचाने की कुंजी है।

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