आर्यिका विभाश्री माताजी के प्रवचन: क्रोध–मान पर विजय को बताया आत्मोन्नति का मार्ग
कोटा। कुन्हाड़ी स्थित दिगंबर जैन मंदिर रिद्धि–सिद्धि में विराजित गणिनी आर्यिका श्री 105 विभाश्री माताजी एवं आर्यिका श्री 105 विनयश्री माताजी (संघ सहित) के सान्निध्य में जारी आध्यात्मिक प्रवचनों में माताजी ने आत्मशुद्धि और साधना के अनेक सूत्रों का विशद् विवेचन किया।अपने प्रवचन में विभाश्री माताजी ने कहा कि क्रोध, मान, माया और मिथ्यात्व जैसे आंतरिक शत्रु आत्मा को संसार बंधन में जकड़े रहते हैं। इन दोषों का क्षय ही आत्मा को प्रगति और मोक्षमार्ग की दिशा में अग्रसर करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य मोह और अविद्या में डूबकर अनंतकाल से भवचक्र में भटक रहा है।माताजी ने भगवान के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्ममार्ग में देर से प्रवृत्त होने वाले व्यक्ति को भी संयम और सहानुभूति के साथ सही दिशा दिखाना हर साधक का कर्तव्य है।
आचार्य विनिश्चय सागर जी का मंगल प्रवेश
मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा ने जानकारी दी कि परम पूज्य गणाचार्य 108 श्री विराग सागर जी महाराज के प्रभावी शिष्य आचार्य 108 श्री विनिश्चय सागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश मंगलवार प्रातः 7:15 बजे ऋद्धि–सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी में होगा।
आचार्य श्री तलवंडी मंदिर से विहार कर पधारेंगे, जहां रजत सिटी और महाराणा प्रताप सर्किल पर गणिनी आर्यिका श्री 105 विभाश्री माताजी ससंघ द्वारा उनका मंगल आगवानी की जाएगी।रिद्धि–सिद्धि मंदिर के महामंत्री पंकज खटोड ने बताया कि “णमो लोए सव्व साहूणं” के मंगल उद्घोष के साथ ऋद्धि–सिद्धि गुरु सेवक संघ और समस्त दिगंबर जैन समाज आचार्य श्री की अगवानी करेगा।
साधना और आत्मबल को जीवन परिवर्तन का आधार बताया
माताजी ने मोक्षमार्ग में अनुकूल मानसिकता और अविचल साधना को अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि बाहरी परिस्थितियों की कठोरता को सहते हुए जो साधक अपने मन को तिक्तता और विक्षेप से रोक लेता है, वही वास्तविक आध्यात्मिक उपलब्धि का पात्र बनता है। उन्होंने निर्विकल्प साधना की कठिनाई का उल्लेख करते हुए कहा—“एक समय भोजन, सीमित जल सेवन, सर्दी–गर्मी का समभाव और संयम—ये साधना के मूल अंग हैं। यदि आत्मबल दृढ़ हो तो जीवन स्वयं परिवर्तन की ओर अग्रसर हो जाता है।”
प्रवचन के दौरान सकल दिगंबर समाज के महामंत्री पदम बड़ला, मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा, मंत्री पंकज खटोड, कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला, पारस कासलीवाल, पारस लुहाड़िया, अशोक सांवाला, निर्मल अजमेरा, अशोक पापडीवाल, सुरेन्द्र पापडीवाल, सुरेश जैन, पारस आदित्य, सेवानिवृत्त न्यायाधीश जितेन्द्र कुमार, महावीर बड़ला, राजकुमार पाटनी, नरेन्द्र कासलीवाल, अजीत गोधा, वर्धमान कासलीवाल, अनिल मित्तल, मनीष सेठी, संजय लुहाड़िया सहित बड़ी संख्या में श्रावक–श्राविकाएं शामिल रहे।
